
कोई झोपड़े को कहता महल की तरह
कोई कीचड़ में रहता कमल की तरह
कोई माँग रहा आँख में काजल की जगह
और कोई खुश है पैर में पायल की तरह
कोई उड़ रहा हवा में आँचल की तरह
कोई खड़ा है ज़मी पर अचल की तरह
कोई रख रहा कदम अब संभल के ज़रा
और कोई झूम रहा यूँहीं पागल की तरह…
कोई एक साथ बारिश-बादल की तरह
कोई साथ साथ पेड़ और फल की तरह
कोई उम्र भर तन्हा उस पल की तरह
जो बीत रहा आज फिर कल की तरह
गम बहा रहा आँख से जल की तरह
कोई गा रहा दर्द अब ग़ज़ल की तरह,
ना मर सका, ना जी रहा, घायल की तरह
बस हँस रहा दर्द में पागल की तरह…
बस हँस रहा दर्द में पागल की तरह…