
मंदिर में जलता हुआ,
तू पाक़ दिया सा लगता है
मस्जिद में चड़ता हुआ,
कोई फूल दुआ का लगता है
बदल गया हो जैसे सब,
ना वक़्त रुका सा लगता है
बुझा दिया इस दिल में जो,
सब बददुआ सा लगता है
तू जो मेरे साथ नहीं,
अब जीना सज़ा सा लगता है
खड़ा अब दूर कहीं,
तू दोस्त खुदा सा लगता है
इन आँखों के तू पास नहीं,
सब धुँआ - धुँआ सा लगता है
और जो सामने इन नज़रों के,
वो चाँद बुरा सा लगता है
आँखों से दिखता नहीं,
होंठ बेज़ुबाँ सा लगता है
दिल को कुछ अच्छा नहीं,
दिल को कुछ अच्छा नहीं,
सब बेवजह सा लगता है
किस्मत में सुकून नहीं,
किस्मत में सुकून नहीं,
कुछ और लिखा सा लगता है
‘आदाब’ भी तेरा आजकल
‘आदाब’ भी तेरा आजकल
अब ‘अलविदा’ सा लगता है…






