
एक पत्ता निकला नया नया,
हर मौसम उसे हँसा गया
पर पतझड़ में वो सूख गया,
वो पत्ता पेड़ से टूट गया
हर साथी उसका छूट गया,
जो रब था उसका रूठ गया
पर पत्ते का कुसूर था क्या,
क्यों पत्ता पेड़ से टूट गया ?
एक पत्ता आज फिर टूट रहा,
सब पत्तों ने एक झूठ कहा
“उस पत्ते से कोई खूब कहाँ,
जो पत्ता पेड़ से टूट गया”
सौ सच से था एक झूठ भला,
गर आँसू किसी का सूख गया
क्यों पत्तों ने सुबूत दिया,
हर पत्ता ख़ुद क्यों टूट गया ?
मैं पता था जो टूट रहा,
हर पत्ता मेरे लिए टूटा था
हर पत्ते में था दोस्त मेरा,
ना एक भी कोई झूठा था…!
हर मौसम उसे हँसा गया
पर पतझड़ में वो सूख गया,
वो पत्ता पेड़ से टूट गया
हर साथी उसका छूट गया,
जो रब था उसका रूठ गया
पर पत्ते का कुसूर था क्या,
क्यों पत्ता पेड़ से टूट गया ?
एक पत्ता आज फिर टूट रहा,
सब पत्तों ने एक झूठ कहा
“उस पत्ते से कोई खूब कहाँ,
जो पत्ता पेड़ से टूट गया”
सौ सच से था एक झूठ भला,
गर आँसू किसी का सूख गया
क्यों पत्तों ने सुबूत दिया,
हर पत्ता ख़ुद क्यों टूट गया ?
मैं पता था जो टूट रहा,
हर पत्ता मेरे लिए टूटा था
हर पत्ते में था दोस्त मेरा,
ना एक भी कोई झूठा था…!
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