
मत बदलना तुम कभी,
यूँहीं मुझ में तुम ढल जाओ
पर तुम रूठो तो कभी,
पर तुम रूठो तो कभी,
चलो थोड़ा सा बदल जाओ...
जो रूठो तुम कभी,
जो रूठो तुम कभी,
यूँ ना आसानी से बहल जाओ
पर तुम पत्थर-दिल नहीं,
पर तुम पत्थर-दिल नहीं,
चलो थोड़ा सा पिघल जाओ...
जो पिघलो तुम कभी,
जो पिघलो तुम कभी,
फिर मुझ में तुम घुल जाओ
पर मुनासिब गर नहीं,
पर मुनासिब गर नहीं,
चलो थोड़ा सा संभल जाओ...
निकलो ना आँखों से कभी,
निकलो ना आँखों से कभी,
मेरे ख़्वाबों में बदल जाओ
पर मेरे अश्कों में भी तुम,
पर मेरे अश्कों में भी तुम,
चलो थोड़ा सा निकल जाओ…
मुनासिब = reasonable
अश्क = tear
2 comments:
hey..very beautifully written....who said u cant write...???u jus did!!!hopin to c more...keep it up!!
Hey sanaa, thanks a lot for reading and saying so...Thank you...!
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