अफ़सोस क्यों करे, कमबख्त फितरत-ए-बशर,
कभी ना तोहफ़ा दिया, जो मिला गँवा बैठा...!

बज़्म-ए-खिरद में शामिल, था कुछ इस क़दर,
दिल-ए-नादाँ को साहिल भुला बैठा...

बज़्म-ए-खिरद में शामिल, था कुछ इस क़दर,
दिल-ए-नादाँ को साहिल भुला बैठा...
सीने में आग कहीं, पानी जला बैठा...!

घर गया जो ख़ुदा के, देखा दर्द का मंज़र,
झोला हर शख्स ही फरयाद में फ़ैला बैठा...

घर गया जो ख़ुदा के, देखा दर्द का मंज़र,
झोला हर शख्स ही फरयाद में फ़ैला बैठा...
लोहा, अश्क फिर, आँख से गला बैठा...!

बयान-ए-रकीब में कहाँ, वो अब आए नज़र,
दोस्त हर शख्स को ईमान से बना बैठा...
बयान-ए-रकीब में कहाँ, वो अब आए नज़र,
दोस्त हर शख्स को ईमान से बना बैठा...

हुआ खुशमिज़ाज अंदाज़ में रुख़सत मगर,
जो किया आखिरी आदाब, रुला बैठा...!
अफ़सोस = regret
फितरत-ए-बशर = nature of human being
गम-ए-फुरक़त = sorrow of separation
नज़र = offering, visible
गँवा = to lose
बज़्म-ए-खिरद = gathering of intellectual people
शामिल = included
अर्ज़-ए-गम = tale of woe
बयान-ए-रकीब = rival's talk
शख्स = person
खुशमिज़ाज = delighted
रुख़सत = to get dismissed, to leave
आदाब = etiquette








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