खुदा ने ख़त एक मेरे जो नाम लिखा था,
किस्मत-ए-हश्र था मेरा, अंजाम लिखा था
बर्दाश्त कर सकूँ मैं, मुझे दर्द ना हो,
नामा-ए-शौक की तरह पैगाम लिखा था...
मुझे सुबह का चिराग़, मुझे ही शाम लिखा था
तू चाँद बेदाग़, फिर भी आम लिखा था
बर्दाश्त कर सकूँ मैं, मुझे दर्द ना हो,
बर्दाश्त कर सकूँ मैं, मुझे दर्द ना हो,
बड़ी शिद्द्त से 'महताब', मेरा नाम लिखा था...
कहीं वास्ता-ए-जहाँ, कहीं फ़रमान लिखा था
तुझे ज़मी कहा, मुझे आसमान लिखा था
तुझे ज़मी कहा, मुझे आसमान लिखा था
बर्दाश्त कर ना सकूँ, इतना दर्द भी अब क्या,
जाने क्यों वो रहमत-ओ-बयान लिखा था...
जाने क्यों वो रहमत-ओ-बयान लिखा था...
बिन तक़ल्लुफ़ आख़िर में नाकाम लिखा था,
तेरे साथ किसी और का फिर नाम लिखा था
चल ख़ास ना सही, अब आम ही सही,
तेरे दोस्तों में कहीं, मेरा नाम लिखा था...!
नामा-ए-शौक = love letter
किस्मत-ए-हश्र = fate on the Judgement Day
आम = common, general
शिद्द्त = rigor, severity, intensity
महताब = moonlight
वास्ता-ए-जहाँ = all sorts of reasoning
फ़रमान = order
रहमत-ओ-बयान = blessings with expression of pity and mercy
तक़ल्लुफ़ = formality
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