माफ़ी करती वो काम, जो सज़ा नहीं करती,वार जिस्म पे तमाम, एक जगह नहीं करती
चाहे माफ़ करो तुम, या अब सज़ा दो मुझे,
वही खुशनसीब पर रूह, जो खता नहीं करती...!
आँखें करती वो काम, जो ज़ुबाँ नहीं करती, मेरी फितरत अब आम, ये भी वफ़ा नहीं करती
उम्मीद-ए-गुफ्तुगू ही क्या अब और के इशारों से,
नज़र आइनों में, खुद से ही मिला नहीं करती...! :-(
कलम करती वो काम, जो हवा नहीं करती,
क्या सुबह क्या शाम, अब रुका नहीं करती
नाम हाथों पे तेरा, लिखे शौक से बड़े,
चले लकीरों पे अगर, कुछ लिखा नहीं करती...! ;-)
गर दर्द की लकीरें, यूँ छुपा नहीं करती,
इन चेहरों पे हँसी, कभी दिखा नहीं करती
खरीद लाये मेरे यार, सब ‘हँसी’ के नक़ाब
कमबख्त ‘ख़ुशी’ जो बाज़ारों में बिका नहीं करती...!
माफ़ी = forgiveness
सज़ा = punishment
वार = attack
तमाम = entire
रूह = soul
खता = mistake
फितरत = nature
आम = common
उम्मीद-ए-गुफ्तुगू = hope of conversation
इशारा = signal
आइना = mirror
कलम = pen
नक़ाब = mask
सज़ा = punishment
वार = attack
तमाम = entire
रूह = soul
खता = mistake
फितरत = nature
आम = common
उम्मीद-ए-गुफ्तुगू = hope of conversation
इशारा = signal
आइना = mirror
कलम = pen
नक़ाब = mask


1 comment:
yo. funny thoughts..
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